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कहानियाँ

काहानियो कि सुरुवात। Story Number 1st

जय श्री राम🙏


आज कहानिया का पहला दिन है। मुझे नहीं आता सही लिखने पर मन के भाव को बाहर लाना भी जरूरी तो कुछ गलत हो तो सीखा देना मुझे ।
तो आप सभी को मेरा सादर नमन!
ज़िन्दगी उलझ सी गई हैं । क्या होरहा ?क्या कर रहा ? क्यों कर रहा ? कुछ समझ नहीं आरहा । और सबसे बुरा बस इस बात का लगता कि क्या सोचके मैं हमेशा घर से दूर जाने वाले बातों पे खुश हुआ करता था😅।

हन तो आगे बताने से पहले कुछ मेरे बारे मैं सुन लो जान लो। मैं बिहार से हु। सुरु से मैं अपने पापा और मम्मी से दूर नाना-नानी के पास रहा पढ़ाई के करण। मेरा गांव दरभंगा डिस्ट्रिक्ट मैं पड़ता हैं । हन! मैं भारतीय बिहारी मैथिल हु। मैं नाना-नानी के साथ पटना मैं रहेता था। दोनों बहुत ही अच्छे थे। हर घर के तरह वहाँ भी नोकझोंक होती थी। मेरे नाना थोड़े ज्यादा ग़ुस्सैल थे। शानिवार और रविवार को मैं घर से बहार नहीं निकलता था। और वो शाम मैं ऑफिस से 6 बजे तक आजाया करते थे। तो उनके आने से पहले मुझे घर पे रहेना पड़ता था वरना डाट सुनना मेरा निस्चित हुआ करता था। घर मैं कुछ भी हो मेरे नाना को लगता था कि मैं ठीक कर लूंगा सब वो मेरे से या कैसे होगा क्या होगा बोलकर काम करवा लेते थे। मुझे फ़ोन चलाते देख वो अंदर से बहुत गुस्सा जाते थे। वहाँ ना मुझे पॉकेट मनी के नाम पे कुछ भी नही मिलता था पर कभी भी मुझे ऐसा लगता ही नहीं था कि कोई काम मेरा पैसे के करण नहीं हो पाया। जब भी मुझे कोई काम आता तो मैं घर मे बोलता नाना जी मुझे काम के थोड़े कम पैसे दे देते थे पर आसानी से नहीं देते थे। पर वहाँ मेरी दूसरी माँ मेरी नानी के रूप मैं वहाँ रहेती थी जो हर काम के लिए मुझे सपोर्ट करती थी। मेरे नानाजी का एक आदत मुझे कभी पंसद नहीं आया वो सारे काम कर तो लेते हैं पर करने से पहले बोलते बहुत है और गुस्साते भी बहुत हैं। हन मेरे पढ़ाई का सीन कुछ ऐसा था कि स्कूल का फ़ीस बस नाना देंगे बाकी जो भी पैसा स्कूल मे लगेगा वो पापा देंगे। तो इस कर्ण हर बार जब मैं एक कक्षा से दूसरे कक्षा मैं जाने को रहेता था तब नानाजी और मेरी मम्मी मैं नोकझोंक होती थी कि ये अब सरकारी स्कूल मैं पढ़ेगा ऐसा नाना बोला करते थे वही मम्मी बोलती थी नही जिस मैं पढ़ रहा उसी मैं पढ़ेगा वरना मैं इश्को (मुझे) लेके चली जीऊँगी।
मुझे समझ तो सब आता था पर मैं बोलता नहीं था पर ये सब देख के वहाँ रहने का मन नहि करता था। मनहिमन सोचता था कि कब मैं यहाँ से निकलूँगा। साल 2018 मैं मैंने दसवी पास की और विज्ञान (बायोलॉजी) लेके बारवी की । साल 2020 मैं मैन बारवी पूरा किया जिस दिन मेरा अंतिम परीक्षा था उस दिन मैं अपने मित्र के साथ मामा के पास चला गया और वहा जाते ही COVID-19 के करण लोकडौन लग गया और इसके कारण मैं वहाँ तीन महीने तक अटक गया। उसके बाद जब मैं वापस पटना आया तब मैंने NEET के लिए पढ़ा तो पर रिजल्ट नहीं ला पाया। 2021 मैं मैंने एक और अतटेम्प दिया और उस मैं भी नही हुआ। मेरे घर मैं मैन अपने सारे बड़े भाईयों से पूछा क्या आगे करू पर किसी ने भी सही से कुछ बताया हि नहीं कभी। हन! हम 6 भाई और सब मैं अच्छी बात-चीत होती है। फिर 2021 मैं मैंने B.Pharmacy मैं एड्मिसन ले लिया जो कि जयपुर से मैं अभी भी कर रहा। एक भैया ने मुझे बताया था अच्छा स्कोप हैं और उन्होंने ही इस जगह और कॉलेज के बारे मैं मुझे बताया। फिर कोरोना के करण फ़ोन से ही सब हुआ। 18 oct 2021 को मेरा क्लास था पहले मैं जयपुर अपने मामा और वही भैया के साथ जयपुर आया था। सबसे पहले कॉलेज जाकर फ़ीस जमा करके वहाँ से निकल के रूम खोजा। एक दुकान वाले से पूछा कि भैया PG या रूम किधर मिलेगा तो उन्होंने साइड मैं बुला कर पूछा कि आप कहा से हो और आपका जात क्या हैं। मामा ने बताया उन्होंने कहा आप तो मेरे ही जात के हो। आइये उपर एक कमरा है आप देख लीजिये कुछ दिन यहाँ रहे लेगा यहाँ से कॉलेज नजदीक हैं फिर दोस्त सब मिलेंगे तो कर लेगा चेंज। मामा ने रूम देखा और बोला ठीक है कुछ दिन यहाँ रुक जाओ फिर धीरे धीरे देख लेना दूसरा रूम। 18 oct 2021 को 3 बजे मामा और भैया चले गए।

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